
भारत में महिलाओं के संपत्ति अधिकारों पर अब तक कई बार बहस हुई, लेकिन हाल में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट्स के फैसलों ने इसे नया आयाम दिया है। इन निर्णयों ने यह साफ़ कर दिया है कि महिला सिर्फ “गृहिणी” नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक इकाई की बराबर साझेदार है। अब अदालतों ने यह स्वीकार करना शुरू किया है कि घर चलाने, बच्चों की देखभाल करने और पति को रोजगार या व्यवसाय में ध्यान देने की सुविधा देने का भी आर्थिक मूल्य होता है।
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घरेलू काम अब “अर्थिक योगदान” के रूप में मान्यता प्राप्त
मद्रास हाई कोर्ट के 2023 के ऐतिहासिक फैसले ने इस सोच को नया रूप दिया। कोर्ट ने कहा कि गृहिणी का श्रम “अदृश्य” नहीं है। जब वह घर संभालती है, बच्चों की परवरिश करती है और परिवार का संतुलन बनाए रखती है, तो वह दरअसल पति की आय का आधार तैयार करती है। कोर्ट ने माना कि अगर पत्नी यह सब न करे, तो पति को यह सब करने के लिए किसी को भुगतान करना पड़ता। इसलिए पत्नी का योगदान भी “संपत्ति अर्जन” का हिस्सा माना जाना चाहिए।
यह निर्णय न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सामाजिक सोच में भी बड़ा बदलाव लाता है अब गृहिणी का श्रम सम्मान और अधिकार दोनों पा रहा है।
‘स्त्रीधन’ पर महिला का पूर्ण अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल के एक मामले में दोहराया कि “स्त्रीधन” पर पति या पति के परिवार का कोई हक नहीं है। शादी के दौरान महिला को जो भी उपहार, गहने या धनराशि मिलती है, वह उसकी निजी संपत्ति है। अगर किसी विवाद या अलगाव की स्थिति में पति या उसके परिवार ने यह स्त्रीधन रोक लिया हो, तो उसे लौटाना कानूनी और नैतिक दोनों दृष्टि से आवश्यक है।
यह फैसला महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता को मजबूती देता है और यह संदेश देता है कि विवाह के बाद भी महिला अपनी संपत्ति की स्वामिनी बनी रहती है।
आत्मनिर्भरता की एक और पहचान
अदालत ने महिलाओं को यह सुझाव भी दिया है कि वे अपनी स्वयं अर्जित संपत्ति या पैतृक हिस्से की सुरक्षा के लिए वसीयत अवश्य बनाएं। ऐसा इसलिए क्योंकि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15(1)(b) के तहत, अगर महिला की मृत्यु बिना वसीयत और संतान के होती है, तो उसकी संपत्ति पति के वारिसों के पास चली जाती है, न कि उसके अपने मायके या माता-पिता के पास।
सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी प्रावधान पर चिंता जताई और कहा कि महिलाओं को अपनी संपत्ति पर स्वयं निर्णय लेने का पूरा अधिकार होना चाहिए। वसीयत बनाकर महिलाएं यह सुनिश्चित कर सकती हैं कि उनकी मेहनत की कमाई या संपत्ति उसी व्यक्ति या परिवार तक पहुंचे, जिनसे उनका भावनात्मक और पारिवारिक जुड़ाव हो।
कोर्ट की टिप्पणियों ने शुरू की नई सोच
इन फैसलों से यह स्पष्ट है कि न्यायपालिका अब महिला के ‘योगदान’ को केवल भावनात्मक या घरेलू स्तर पर नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टिकोण से भी देख रही है। इससे न केवल महिलाएं जागरूक होंगी, बल्कि समाज भी यह समझेगा कि महिला किसी परिवार की “सहायक” नहीं, बल्कि “सह-निर्माता” है। कोर्ट का दृष्टिकोण अब पारदर्शी और प्रगतिशील हो रहा है जहां विवाह को साझेदारी के रूप में देखा जा रहा है, और दोनों के योगदान को समान सम्मान मिल रहा है।
आगे की दिशा
कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बदलाव आने वाले समय में महिलाओं को और सशक्त करेगा। यदि सरकार हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15(1)(b) पर पुनर्विचार करती है, तो यह महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों में ऐतिहासिक सुधार होगा। साथ ही, वसीयत को लेकर जागरूकता बढ़ाना भी बेहद जरूरी है ताकि महिलाएं अपनी संपत्ति पर खुद फैसला ले सकें।
अंततः, अदालतों के ये हालिया फैसले महिलाओं को यह भरोसा दिलाते हैं कि उनका श्रम, संपत्ति और निर्णय तीनों की कानून में बराबर अहमियत है। यह केवल न्यायालयों के आदेश नहीं, बल्कि समाज के बदलते रवैये का प्रतीक हैं जहां समानता अब एक विचार नहीं, बल्कि हकीकत बनने की राह पर है।

















