
मेरठ में रिंग रोड निर्माण और बिजली बंबा बाईपास चौड़ीकरण की चर्चाएं भले ही सालों से चल रही हों, लेकिन हकीकत यह है कि आज तक ये दोनों प्रोजेक्ट फाइलों से बाहर नहीं निकल पाए हैं। अब एक बार फिर सर्वे शुरू हुआ है, यह सुनते ही लोगों को उन पुराने वादों की याद आती है जो हर बार केवल “प्रस्ताव” और “मंजूरी” तक ही सीमित रह गए।
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शासन से वार्ता के बाद भी शुरुआत अधर में
यह परियोजना इतनी लंबी क्यों खिंच रही है, यह सवाल हर नागरिक के मन में है। शासन स्तर पर बातचीत पूरी हो चुकी है, एलाइनमेंट सर्वे भी कर लिया गया है, लेकिन फिर से सर्वे की प्रक्रिया शुरू किए जाने से अंदेशा है कि काम एक बार फिर लंबा खिंच सकता है। मेरठ विकास प्राधिकरण (मेडा) ने अब दोनों योजनाओं के लिए नई टीमें लगा दी हैं, जो यह देखेंगी कि यदि इनको पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल पर बनाया जाए तो इसकी व्यवहार्यता क्या होगी।
धन की कमी बनी सबसे बड़ी रुकावट
दोनों परियोजनाओं की सबसे बड़ी बाधा धन की कमी है। रिंग रोड का जो रूट प्रस्तावित है, वह बुलंदशहर-हापुड़ हाईवे से शुरू होकर जुर्रानपुर रेलवे लाइन, दिल्ली रोड होते हुए दून बाईपास तक जाएगा। इस हिस्से के लिए लगभग 15 हेक्टेयर भूमि खरीदी जानी है, जिस पर 162 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसके अलावा निर्माण कार्य में 300 करोड़ रुपये अलग से लगेंगे, जिनमें फ्लाईओवर, अंडरपास, नाले और विद्युतिकरण जैसे काम शामिल हैं।
मेडा के पास अपने कोष से केवल 100 करोड़ रुपये का प्रावधान है, जबकि शेष 262 करोड़ रुपये शासन से मांगे गए हैं। लेकिन शासन से अब तक कोई आधिकारिक स्वीकृति या पत्र नहीं मिला है, जिससे परियोजना फिर ठहर सी गई है।
बिजली बंबा बाईपास का भी यही हाल
बिजली बंबा बाईपास का चौड़ीकरण भी पिछले कई वर्षों से चर्चा में है। इस पर लगभग 200 करोड़ रुपये का खर्च अनुमानित है। शासन को यह रकम देना मुश्किल लग रहा है, इसी कारण इन दोनों सड़कों को पीपीपी मॉडल पर तैयार करने की संभावना तलाशनी शुरू की गई है। इस मॉडल में किसी निजी निवेशक को परियोजना में लगाया जाएगा, जो निर्माण का खर्च उठाकर बाद में टोल या अन्य माध्यमों से अपनी निवेश वापसी करेगा।
कैसे काम करेगा पीपीपी मॉडल
सरकार की मंशा है कि निवेशक को आकर्षित करने के लिए उसे आर्थिक रियायतें दी जाएं। जैसे—भूमि उपयोग परिवर्तन शुल्क की छूट, एफएआर (फ्लोर एरिया रेशो) में राहत, और कुछ टैक्स छूटें। बदले में निवेशक पूरी परियोजना की लागत वहन करेगा। हालांकि, ऐसे मॉडल तब तक कारगर नहीं हो सकते जब तक नीतिगत स्पष्टता और समयबद्धता न हो, क्योंकि अक्सर निवेशक सरकारी मंजूरी में देरी से हतोत्साहित होते हैं।
12 साल से अधर में लटका ओवरब्रिज
इन अवरुद्ध परियोजनाओं की कहानी कोई नई नहीं। 2011 में जब इस क्षेत्र में ओवरब्रिज निर्माण की नींव रखी गई थी, तब तय हुआ था कि भूमि की खरीद मेडा करेगा, सड़क पीडब्ल्यूडी बनाएगा और रेलवे पुल का निर्माण करेगा। रेलवे ने तो ओवरब्रिज बना भी दिया, लेकिन मेडा जमीन नहीं खरीद सका। नतीजा एप्रोच रोड आज तक नहीं बनी और बना हुआ ओवरब्रिज हवा में लटका रह गया।
कई बार बने प्रस्ताव, हर बार निरस्त
पिछले एक दशक में इस प्रोजेक्ट के लिए कई बार प्रस्ताव बने, लेकिन हर सरकार ने किसी न किसी कारण से फाइल वापस कर दी। कभी एनएचएआई को काम देने की कोशिश की गई, पर उन्होंने जमीन अधिग्रहण की जिम्मेदारी से हाथ झाड़ लिया। बाद में पीडब्ल्यूडी ने 300 करोड़ रुपये का प्रस्ताव भेजा, जिसे शासन ने ठुकरा दिया। फिर 291 करोड़ रुपये का नया प्रस्ताव गया, जिसमें कहा गया था कि अगर पीडब्ल्यूडी भूमि खरीद ले तो मेडा निर्माण करेगा लेकिन यह योजना भी ठंडी पड़ गई।
जनता में बढ़ी नाराज़गी, पर उम्मीद अब भी बाकी
शहरवासी अब इन प्रोजेक्ट्स को लेकर बेहद निराश हैं। हर बार नई घोषणा, नया सर्वे और नई उम्मीद दिखाई जाती है, लेकिन जमीन पर कुछ होता नहीं। लोग अब पूछने लगे हैं क्या यह रिंग रोड और बाईपास कभी हकीकत बन पाएंगे या फिर यह राजनीति और प्रस्तावों के जाल में ही उलझे रहेंगे?
फिर भी, यदि पीपीपी मॉडल में ईमानदारी से निवेशक और सरकार साथ आएं तो मेरठ के लिए यह परियोजनाएं ट्रैफिक बोझ कम करने और शहर को नई दिशा देने वाली साबित हो सकती हैं। उम्मीद है कि इस बार सिर्फ चर्चा नहीं, बल्कि निर्माण की शुरुआत भी जल्द देखने को मिले।




