
पैतृक संपत्ति (Ancestral Property) में बेटियों के अधिकार को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी रिकॉर्ड या राजस्व दस्तावेजों (Revenue Records) में नाम दर्ज होने मात्र से किसी व्यक्ति को संपत्ति का वास्तविक मालिक नहीं माना जा सकता, यह आदेश उन भाइयों या रिश्तेदारों के लिए एक बड़ा झटका है, जो केवल कागजी कार्रवाई के दम पर बहनों को उनके हक से वंचित रखते आए हैं।
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राजस्व रिकॉर्ड मालिकाना हक का प्रमाण नहीं
हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में साफ किया कि राजस्व विभाग के रिकॉर्ड, जैसे खतौनी या म्यूटेशन, केवल प्रशासनिक और कर (Taxation) उद्देश्यों के लिए होते हैं, इनसे संपत्ति के स्वामित्व (Title) का निर्धारण नहीं होता। अदालत ने कहा कि जब तक संपत्ति का बंटवारा कानूनी रुप से न हो या कोई पंजीकृत दस्तावेज (Registered Deed) मौजूद न हो, तब तक केवल रिकॉर्ड में नाम होने से किसी का दावा पुख्ता नहीं हो जाता।
बेटियों की बड़ी जीत
हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि बेटियां जन्म से ही संपत्ति में समान हिस्सेदार (Coparcener) हैं, कोर्ट के इस आदेश के बाद अब पुरुष सदस्य केवल इस आधार पर पैतृक संपत्ति पर अपना एकाधिकार नहीं जता पाएंगे कि सरकारी फाइलों में उनका नाम पहले से दर्ज है।
अदालत के आदेश के मुख्य बिंदु
- मालिकाना हक साबित करने के लिए सेल डीड, वसीयत या कोर्ट की डिक्री अनिवार्य है।
- पैतृक संपत्ति में भाई और बहन का अधिकार बराबर है, चाहे रिकॉर्ड में किसी का भी नाम हो।
- सरकारी कागजों में नाम चढ़ाना एक प्रक्रिया है, मालिकाना हक का अंतिम फैसला नहीं।
कानूनी जानकारों का मानना है कि इस फैसले से उन महिलाओं को मजबूती मिलेगी जो लंबे समय से अपनी पैतृक संपत्ति के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं, यदि आप भी संपत्ति विवाद या कानूनी सहायता चाहते हैं, तो सरकार के National Legal Services Authority (NALSA) पोर्टल पर संपर्क कर सकते हैं।

















