
भारत में अक्सर किसी की मृत्यु के बाद परिवारों में विरासत को लेकर विवाद सामने आते हैं। कहीं जमीन-जायदाद को लेकर झगड़े होते हैं, तो कहीं ज्वैलरी तक को ले कर मतभेद हो जाते हैं। खासकर तब जब सास के गुजर जाने के बाद सवाल उठता है कि उनके पास जो गहने थे — क्या अब बहू का अधिकार होगा या बेटी का? बहुत से लोग भावनाओं के आधार पर जवाब ढूंढ़ते हैं, लेकिन असल सच्चाई कानून से तय होती है।
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अगर बनी है वसीयत, तो मामला साफ है
अगर सास ने अपने जीवनकाल में वसीयत (Will) तैयार की है, तो Jewellery उसी व्यक्ति की मानी जाएगी जिसका नाम उस वसीयत में दर्ज है। इस स्थिति में न तो बहू का रिश्ता मायने रखता है, न ही बेटी होने का।
कानून साफ कहता है — वसीयत में जिसका नाम है, वही ज्वैलरी की वैध मालिक कहलाएगी।
अक्सर महिलाएं अपनी भावनाओं, भरोसे या जरूरत के हिसाब से संपत्ति और गहनों का बंटवारा अलग-अलग लोगों के लिए लिखवा देती हैं। ऐसा करने पर बाद में कोई भी पारिवारिक सदस्य इस पर दावा नहीं कर सकता, जब तक कि वसीयत धोखाधड़ी या दबाव में तैयार की गई न हो।
अगर वसीयत नहीं है – तो क्या होगा?
अब अहम सवाल यही है कि अगर सास बिना वसीयत के (Intestate) ही गुजर जाएं, तो ज्वैलरी पर किसका अधिकार होगा?
इस स्थिति में कानून के अनुसार ज्वैलरी उनकी legal heirs यानी कानूनी वारिसों में बराबर बंट जाती है।
इन कानूनी वारिसों में शामिल होते हैं –
- पति
- बेटे
- बेटियां
- और माता (अगर जीवित हों)
बहू इस कानूनी सूची का हिस्सा नहीं होती। यानी सास की मृत्यु के बाद बहू को सीधे तौर पर ज्वैलरी का अधिकार नहीं मिलता, जब तक कि बेटे (जो खुद एक कानूनी वारिस है) उसे अपने हिस्से की ज्वैलरी न सौंपे या परिवार एकमत होकर फैसला न करे।
जब केवल बच्चे ही वारिस हों
अगर सास के पति और माता पहले ही गुजर चुके हैं तो ज्वैलरी का अधिकार उनके बच्चों — बेटों और बेटियों — में बराबर विभाजित होता है। यहां यह जानना जरूरी है कि कानून पुत्र और पुत्री दोनों को समान अधिकार देता है।
इसका मतलब यह हुआ कि शादीशुदा बेटी भी मां की ज्वैलरी पर उतना ही हक रखती है जितना बेटा।
कई घरों में अब भी यह गलतफहमी बनी हुई है कि “शादीशुदा बेटी को हिस्सा नहीं मिलता”, लेकिन भारतीय उत्तराधिकार कानून (Hindu Succession Act) के तहत यह दावा बिल्कुल गलत है।
बहू कब बन सकती है हकदार?
बहू का नाम तभी आता है जब उसका पति — यानी सास का बेटा — अपने हिस्से में मिली ज्वैलरी उसे दे देता है या परिवार की अंदरूनी सहमति से बहू के नाम ट्रांसफर होती है।
कानूनी दृष्टि से यह एक voluntary transfer of ownership माना जाएगा, यानि बेटे की मर्ज़ी से हुआ ट्रांसफर।
अगर बेटा चाहता है कि उसकी पत्नी (बहू) को सास के गहनों का अधिकार मिले, तो वह यह लिखित समझौते के जरिए कर सकता है।
संस्कार से ज्यादा ज़रूरी है कानूनी समझ
भारतीय समाज में अक्सर रिश्तों की गर्माहट के कारण संपत्ति और ज्वैलरी के मामलों पर सीधे नियमों की बजाय भावनाओं से फैसले हो जाते हैं। लेकिन समझने की बात यह है कि “भरोसे” से बढ़कर “कानूनी हक” होता है।
यदि सास चाहती हैं कि उनकी ज्वैलरी किसी विशेष व्यक्ति — चाहे वह बहू हो, बेटी हो या पोती — के पास जाए, तो सबसे बेहतर तरीका है कि वे स्पष्ट वसीयत तैयार कर जाएं।
यह न सिर्फ भविष्य के विवादों को रोकता है बल्कि परिवार में सम्मान और शांति बनाए रखता है।

















