नाना की प्रॉपर्टी पर नाती-नातिनों का कोई हक नहीं! कोर्ट का बड़ा फैसला, दावा नहीं कर सकते

दिल्ली और बॉम्बे हाईकोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार कानून साफ किया: माता-पिता जिंदा रहते नाना-नानी की संपत्ति पर नाती-नातिन का कोई जन्मसिद्ध हक नहीं। क्लास-1 वारिसों (बेटे-बेटियां) को पहले अधिकार। स्व-अर्जित या पैतृक संपत्ति पर भी यही नियम। केवल मां-बाप के निधन पर दावा संभव।

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big decision on birthright of maternal grandchildren in ancestral property

परिवार में संपत्ति के बंटवारे को लेकर अक्सर झगड़े होते हैं, खासकर जब नाती-नातिन नाना-नानी की दौलत पर नजर गड़ाते हैं। दिल्ली और बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल के फैसलों से साफ कर दिया कि माता-पिता जिंदा रहते नाती-नातिनों को कोई जन्मजात हक नहीं मिलता। यह फैसला हिंदू कानून की बुनियाद पर टिका है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी अधिकार तय करता है।

हिंदू उत्तराधिकार कानून की बुनियाद

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 कहता है कि बिना वसीयत के संपत्ति सबसे पहले क्लास-1 वारिसों को जाती है। इसमें बेटे, बेटियां और विधवा शामिल हैं, लेकिन पोते-पोतियां तभी आगे आते हैं जब उनके मां-बाप न रहें। अगर नाना की बेटी या बेटा जीवित हैं, तो संपत्ति उसी पीढ़ी तक रुक जाती है। यह नियम पुरानी परंपराओं को आधुनिक कानून से जोड़ता है।

स्व-अर्जित संपत्ति का क्या होता है

नाना-नानी ने खुद मेहनत से कमाई हो या खरीदी हो, ऐसी संपत्ति पर उनका पूरा हक है। वे वसीयत लिखकर किसी को भी दे सकते हैं। बिना वसीयत के यह क्लास-1 वारिसों में बंटती है। नाती-नातिन यहां सीधे कूद नहीं सकते, जब तक मां-बाप न मरें। कई परिवारों में इसी गलतफहमी से कोर्ट तक बात पहुंच जाती है।

पैतृक संपत्ति में भ्रम की सफाई

पैतृक संपत्ति का हक ज्यादातर दादा-दादी की ओर से मिलता है, नाना पक्ष से नहीं। बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि नाना की पैतृक संपत्ति में भी नाती-नातिनों का जन्म से हक नहीं। 2005 के संशोधन ने बेटियों को बराबरी दी, लेकिन नाती-नातिन अभी भी दूसरी कतार में हैं। यह फैसला पुराने कानूनी झोलों को भरता है।

अधिकार कब खुलता है नाती-नातिनों का

केवल वही स्थिति है जब माता-पिता नाना-नानी से पहले चल बसे हों, तभी नाती-नातिन सीधे दावा कर सकते हैं। जीवित मां-बाप होने पर संपत्ति उनके पास जाती है, और बाद में वे तय करेंगे। कोर्ट ने जोर दिया कि कानून पीढ़ीगत क्रम मानता है, कोई शॉर्टकट नहीं। इससे परिवारिक झगड़े कम हो सकते हैं।

परिवारिक विवादों पर असर

ये फैसले संपत्ति के लालच से उपजे झगड़ों पर ब्रेक लगाते हैं। अब लोग पहले कानून समझेंगे, वकीलों के चक्कर कम लगेंगे। माता-पिता को सलाह है कि वसीयत बनाएं, ताकि इच्छा स्पष्ट हो। समाज में यह संदेश जाता है कि कानून सबको बराबर सुरक्षा देता है, बिना किसी को ठगा जाए।

अब परिवारों को वसीयत और कानूनी सलाह पर ध्यान देना चाहिए। कोर्ट का मकसद न्याय है, न कि किसी का हक छीनना। अगर सही समझ आए, तो संपत्ति बंटवारा शांति से हो सकता है। ये फैसले कानूनी स्पष्टता लाते हैं, जो लंबे समय तक काम आएंगे। 

Author
Pinki

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