
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि निःसंतान हिंदू विधवा की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति पर पहला अधिकार उसके मायके वालों का नहीं, बल्कि उसके पति के परिवार का होता है, कोर्ट ने माना कि आज महिलाएं शिक्षा, रोजगार और उद्यमिता के कारण बड़ी मात्रा में स्वयं अर्जित संपत्ति की मालिक हैं, और ऐसे मामलों में उनके माता-पिता को किनारे कर देना विवाद पैदा कर सकता है, कोर्ट ने यह निर्णय देते हुए सदियों पुरानी एक कानूनी दुविधा को सुलझा दिया है।
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क्या था मामला?
दरअसल, यह कानूनी लड़ाई इस बात पर केंद्रित थी कि यदि कोई हिंदू विधवा महिला बिना वसीयत बनाए और बिना किसी संतान के दुनिया छोड़ देती है, तो भारतीय उत्तराधिकार कानून के तहत उसकी संपत्ति किसे मिलेगी – उसके माता-पिता और भाई-बहनों को, या उसके दिवंगत पति के कानूनी वारिसों को?
सुप्रीम कोर्ट का तर्क और फैसला
न्यायमूर्ति अशोक भूषण (अब सेवानिवृत्त) और न्यायमूर्ति आर. सुभाष रेड्डी की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि एक बार शादी होने के बाद महिला अपने पति के परिवार का हिस्सा बन जाती है, इस तर्क के आधार पर, कोर्ट ने माना कि यदि महिला की मृत्यु के बाद कोई प्रत्यक्ष वारिस नहीं है, तो उसकी संपत्ति पर पति के कानूनी वारिसों, जैसे कि पति के भाई-बहन या उनके वंशजों का अधिकार होगा।
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मायके की संपत्ति पर मायके का हक
हालांकि, कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण अपवाद भी बताया है, यदि महिला को संपत्ति अपने माता-पिता या मायके पक्ष के अन्य सदस्यों से विरासत में मिली थी, तो उसकी मृत्यु के बाद वह संपत्ति उसके मायके वालों को ही वापस मिलेगी, यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि विवाह के बाद महिला का नया परिवार ही उसकी अर्जित या पति से मिली संपत्ति का प्राथमिक उत्तराधिकारी होता है।

















