Property Rights: बेटी को बेदखल करना हुआ नामुमकिन! हाई कोर्ट का बड़ा आदेश—बिना रजिस्टर्ड वसीयत के संपत्ति पर कोई दावा नहीं

अब बेटी को संपत्ति से बेदखल करना नामुमकिन, बिना रजिस्टर्ड वसीयत कोई दावा नहीं चलेगा। जानें कैसे यह फैसला बदल देगा परिवारों की जमीन और वसीयत संबंधी नियम।

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Property Rights: बेटी को बेदखल करना हुआ नामुमकिन! हाई कोर्ट का बड़ा आदेश—बिना रजिस्टर्ड वसीयत के संपत्ति पर कोई दावा नहीं
Property Rights: बेटी को बेदखल करना हुआ नामुमकिन! हाई कोर्ट का बड़ा आदेश—बिना रजिस्टर्ड वसीयत के संपत्ति पर कोई दावा नहीं

दिल्ली हाई कोर्ट ने संपत्ति कानून (Property Law) के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण और महिलाओं के अधिकारों के लिए मील का पत्थर साबित होने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (Hindu Succession Act, 1956) के तहत बेटी को पिता की HUF (Hindu Undivided Family) संपत्ति में सहदायिक अधिकार (Coparcenary Rights) मिलेगा, भले ही परिवार ने सालों पहले संपत्ति का समझौता (Compromise Decree) कर लिया हो।

इस फैसले से स्पष्ट हुआ कि पुराने समझौते और पारिवारिक विवाद बेटी के जन्मसिद्ध अधिकारों को रोकने में सक्षम नहीं हैं। जस्टिस अनिल क्षत्रपाल और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की डिवीजन बेंच ने विभाजन सूट (Partition Suit) को शुरुआती दौर में खारिज करने की अपील को रद्द कर दिया और कहा कि विवादित मुद्दों (Triable Issues) की सुनवाई आवश्यक है।

केस का पूरा परिप्रेक्ष्य

यह मामला श्रीमती सोनाक्षी गुप्ता बनाम L.R. गुप्ता HUF से संबंधित है। वादी ने सिविल सूट CS(OS) 1965/2012 में दावा किया कि 2005 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में हुए संशोधन के कारण वह संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति में सहदायिक (Coparcener) बन गई हैं।

वादी का आरोप था कि उनकी सहमति के बिना संपत्ति बेची जा रही थी और जब उन्होंने 2011 और 2012 में बंटवारे की मांग की, तो उसे अस्वीकार कर दिया गया। इसके जवाब में प्रतिवादी, श्री संजय गुप्ता और अन्य, ने सिविल प्रोसीजर कोड (CPC) के तहत मुकदमा खारिज करने की याचिका दायर की।

अपीलकर्ता का तर्क

अपीलकर्ता (Appellant) के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मनीष वशिष्ठ ने कोर्ट में तर्क दिया कि परिवार की अलग-अलग शाखाओं के बीच संपत्ति विवाद पहले ही 9 जनवरी 2006 के समझौते (Compromise Decree) के माध्यम से हल हो चुका है।

अपीलकर्ता का कहना था कि 1993 में परिवार की शाखाओं के बीच हुआ विभाजन सभी संपत्ति और अधिकारों को स्पष्ट रूप से निर्धारित कर चुका था। इसलिए, वर्तमान मुकदमा गैरजरूरी है।

वादी का मुख्य तर्क

वादी ने कोर्ट में जोर देकर कहा कि 1993 का बंटवारा केवल संपत्ति तक सीमित था और इसे हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) में सहदायिक अधिकारों को प्रभावित करने वाला नहीं माना जा सकता।

मुख्य बिंदु:

  • वादी एक बेटी है और 2005 के संशोधन के तहत वह HUF संपत्ति में Coparcener बन गई हैं।
  • 2006 का समझौता केवल पुरुष सदस्यों के बीच था और नाबालिग वादी उस समय इसमें शामिल नहीं थीं।
  • प्रतिवादियों द्वारा संपत्ति को लगातार बेचने और निर्माण करने के कार्य जारी हैं, जिससे वादी का “नया और निरंतर वाद कारण” (Cause of Action) उत्पन्न हो रहा है।

कोर्ट का विश्लेषण

डिवीजन बेंच ने Order VII Rule 11 CPC के तहत यह स्पष्ट किया कि किसी मुकदमे को शुरुआती दौर में ही खारिज करने की शक्ति सीमित है। कोर्ट ने कहा कि वादी के दावे को ध्यानपूर्वक और सार्थक रूप से पढ़ना आवश्यक है, केवल तकनीकी आधार पर इसे खारिज नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि वादी ने अपने दावे में विस्तार से उल्लेख किया कि किस प्रकार पुराने समझौते और संपत्ति के लेन-देन ने उनके अधिकारों को प्रभावित किया। इस कारण, यह मामला केवल ट्रायल के बाद ही सुलझ सकता है।

बेटियों के अधिकारों के लिए मील का पत्थर

इस फैसले से स्पष्ट हुआ कि बेटियाँ अपने पैतृक HUF संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकारों (Birthright) के लिए कानूनी रूप से हकदार हैं। पुराने पारिवारिक समझौते या संपत्ति के विक्रय से ये अधिकार समाप्त नहीं होते।

विशेष रूप से यह फैसला महिलाओं के आर्थिक अधिकारों को मजबूत करता है और संकेत देता है कि कानून में संशोधन (Hindu Succession Amendment, 2005) केवल कागजों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यावहारिक अधिकारों में भी बदलाव लाता है।

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Author
Pinki

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