
शादी तो दो लोगों का साथ निभाने का बंधन है, लेकिन जब बातें बिगड़ जाती हैं और कोर्ट तक पहुंच जाती हैं, तो अक्सर महिलाओं को लगता है कि उनका कोई सहारा नहीं। लेकिन अच्छी बात ये है कि हमारे सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट्स ने बार-बार साबित किया है कि पत्नी सिर्फ घर संभालने वाली नहीं, बल्कि बराबर की पार्टनर है। पति की जिम्मेदारी सिर्फ खुशियां बांटना नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा देना भी है। चाहे पत्नी कितनी भी पढ़ी-लिखी हो या कमाती हो, भरण-पोषण का हक बना रहता है। आइए, पांच ऐसे रियल केस देखें, जो हर औरत को ताकत देंगे।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला
सोचिए, एक औरत डॉक्टर या इंजीनियर है, तो क्या पति कह देगा कि ‘तुम खुद कमाओ, मुझे कुछ मत दो’? बिल्कुल नहीं! इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में ऐसा ही केस सुना। वहां जज ने साफ कहा कि पत्नी की डिग्री या बिजनेस स्किल्स भरण-पोषण रोकने का बहाना नहीं बन सकतीं। फैमिली कोर्ट का पुराना फैसला पलट दिया गया। जज गरिमा प्रसाद ने टोका, “पति अपनी कानूनी ड्यूटी से ऐसे ही भाग नहीं सकता।” ये फैसला लाखों महिलाओं के लिए मिसाल है – योग्यता कमजोरी नहीं, ताकत है!
दिल्ली हाईकोर्ट ने ठुकराई अपील
कई बार पति कहते हैं, “तुम तो जॉब कर रही हो, भत्ता क्यों?” दिल्ली हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक अपील ठुकराई। कोर्ट ने पति को हर महीने 17 हजार रुपये देने का ऑर्डर दिया। जजों ने कहा, “पत्नी की छोटी-मोटी इनकम से उसकी जरूरतें पूरी नहीं होतीं। शादी का मतलब है साथ में जिंदगी चलाना, न कि बोझ डालना।” ये केस बताता है कि आर्थिक आजादी का मतलब पति की जिम्मेदारी खत्म नहीं। औरतें भी इंसान हैं, उनकी लाइफस्टाइल बरकरार रखनी ही पड़ेगी।
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट का राजनैश बनाम नेहा वाला केस तो गेम-चेंजर है। कोर्ट ने फरमान सुनाया कि पति को पत्नी को वैसी ही जिंदगी जीने दें, जैसी शादी से पहले थी। चाहे पत्नी खुद कमाती हो, भरण-पोषण का क्लेम वैलिड रहता है। जजों ने कहा, “शादी में स्टेटस मैच करना पड़ता है।” सोचिए, शादी के बाद लग्जरी कम हो जाए, तो कितना दर्द होता होगा। ये फैसला पतियों को आईना दिखाता है – जिम्मेदारी निभाओ, बहाने मत बनाओ।
साथ न रहने पर भी पैसा मिलेगा
कभी-कभी कोर्ट पति को ‘कंजुगल राइट्स’ का डिक्री दे देता है, यानी पत्नी को साथ रहने का ऑर्डर। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने क्लियर किया – इससे भरण-पोषण का हक खत्म नहीं होता। चाहे पत्नी अलग रहे, पति को आर्थिक मदद देनी ही पड़ेगी। जजों ने भावुक होकर कहा, “महिला की सिक्योरिटी सबसे ऊपर है।” ये फैसला घरेलू झगड़ों में फंसी औरतों के लिए राहत है। अलगाव का मतलब आर्थिक तंगी नहीं।
जायज वजह से अलगाव पर हक बरकरार
रीना कुमारी बनाम दिनेश कुमार महतो केस में सुप्रीम कोर्ट ने फिर धमाका किया। अगर पत्नी किसी ठोस वजह से – जैसे क्रूरता या गलत हरकत – अलग रह रही है, तो भरण-पोषण मिलेगा ही। कोर्ट ने कहा, “कंजुगल राइट्स रिस्टोर करने का ऑर्डर भी उसके हक न छीन ले।” ये फैसला बताता है कि न्याय साइड लेता है, जहां क्रुएल्टी हो। लाखों महिलाएं अब डरेंगी नहीं – हक लडेंगी और जीतेंगी।
दोस्तों, ये केस साबित करते हैं कि कानून महिलाओं के साथ है। अगर आप या कोई जानने वाला फंस गया है, तो वकील से बात करें। भरण-पोषण सिर्फ पैसे की बात नहीं, सम्मान की है। शादियां टूटेंगी, लेकिन हक नहीं। जागरूक रहें, मजबूत रहें!

















