सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया है कि मोटर वाहन दुर्घटनाओं में पीछे बैठने वाले यात्री (Pillion Rider) को ‘अंशदायी लापरवाही’ (Contributory Negligence) के दायरे में तब तक नहीं लाया जा सकता, जब तक कि उसके लापरवाह होने के ठोस सबूत मौजूद न हों।
इस आदेश के तहत कोर्ट ने उस स्थिति पर भी रोशनी डाली, जहां दो वाहनों की टक्कर में एक पिलियन राइडर घायल होता है। न्यायालय के अनुसार, ऐसे मामलों को ‘समग्र लापरवाही’ (Composite Negligence) की श्रेणी में रखा जाना चाहिए, यानी पीड़ित व्यक्ति किसी भी दोषी पक्ष से पूरा मुआवजा पाने का हकदार है।

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केस की पृष्ठभूमि
यह मामला कर्नाटक के यशवंत कृष्णा कुंबर से जुड़ा है, जो 2014 में एक मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे हुए दुर्घटना के शिकार हुए थे। दूसरी बाइक की तेज और लापरवाह ड्राइविंग के कारण उन्हें गंभीर चोटें आईं और बाद में उनका दाहिना पैर घुटने के नीचे से काटना पड़ा।
मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) और कर्नाटक हाईकोर्ट दोनों ने माना कि दुर्घटना में दोनों वाहन चालक दोषी थे, जिसके आधार पर वादी को मिलने वाले मुआवजे में 50% की कटौती कर दी गई। इससे असंतुष्ट होकर कुंबर ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट में बहस
अपीलकर्ता की ओर से वकील ने तर्क दिया कि एक पीछे बैठने वाले यात्री पर लापरवाही का आरोप लगाना न तो तर्कसंगत है और न ही सबूतों पर आधारित। साथ ही यह भी कहा गया कि वादी की विकलांगता और पेशे को देखते हुए मुआवजा बेहद कम था।
वहीं बीमा कंपनी ने हाईकोर्ट के आदेश को पूरी तरह सही ठहराया और मुआवजे के विभाजन का समर्थन किया।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
दो जजों की पीठ — जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया — ने यह माना कि निचली अदालतों ने “गलत धारणा” अपनाई कि दो चालकों की गलती का असर पिलियन राइडर पर भी डाला जा सकता है। अदालत ने कहा कि अंशदायी लापरवाही सिद्ध करने के लिए यह स्पष्ट दिखाना आवश्यक है कि घायल व्यक्ति के किसी कार्य या गलती ने वास्तव में दुर्घटना में योगदान दिया है।
कोर्ट ने 2008 के टी.ओ. एंथनी बनाम करवर्णन मामले का हवाला देते हुए बताया कि जहां कई गाड़ियों की लापरवाही से कोई तीसरा व्यक्ति घायल होता है, वहां यह “समग्र लापरवाही” का मामला होता है और पीड़ित किसी भी दोषी से पूरा हर्जाना मांग सकता है।
मुआवजे की पुनर्गणना
सुप्रीम कोर्ट ने वादी की मासिक आय को न्यायसंगत रूप से 10,000 रुपये माना और भविष्य की कमाई की संभावनाएं जोड़कर इसे 14,000 रुपये आंका। 55% स्थायी विकलांगता और 15 के गुणक के आधार पर कमाई की हानि का अनुमान 13.86 लाख रुपये लगाया गया।
कोर्ट ने उपचार के दौरान हुई आय की हानि को भी 40,000 रुपये तक बढ़ा दिया और अंततः कुल मुआवजा 16.37 लाख रुपये के रूप में तय किया, जिस पर 6% वार्षिक ब्याज भी देय होगा।
निर्णय का सार
यह फैसला न केवल कानून के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि सड़क दुर्घटनाओं में पीड़ितों के अधिकारों को भी मजबूत करता है। अब केवल इस आधार पर कि ड्राइवर गलत था, पीछे बैठे व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकेगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है — न्याय केवल तथ्यों और सबूतों के आधार पर ही तय किया जाएगा, अनुमान या धारणा के आधार पर नहीं।

















