
दिल्ली हाईकोर्ट ने दिसंबर 2025 में एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है जिसने हजारों शिक्षकों की उम्मीदों को नया जीवन दे दिया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि B.Ed (स्पेशल एजुकेशन) की डिग्री रखने वाले उम्मीदवार अब सामान्य स्कूलों में TGT (Trained Graduate Teacher) और PGT (Post Graduate Teacher) के पदों के लिए भी पूरी तरह योग्य माने जाएंगे। यह निर्णय न सिर्फ शिक्षकों के लिए राहत भरा है बल्कि समावेशी शिक्षा की भावना को भी मजबूती प्रदान करता है।
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CAT के पुराने आदेश को बरकरार रखा
दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस सौरभ बनर्जी की खंडपीठ ने यह फैसला देते हुए केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के पिछले आदेश को बरकरार रखा। उस आदेश में कहा गया था कि स्पेशल एजुकेशन में B.Ed करने वाले अभ्यर्थी भी सामान्य शिक्षण पदों के लिए पात्र हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर किसी भर्ती विज्ञापन में केवल “शिक्षण में डिग्री या डिप्लोमा” मांगा गया है और स्पेशल एजुकेशन को स्पष्ट रूप से बाहर नहीं किया गया, तो ऐसे उम्मीदवारों को बाद में अयोग्य घोषित करना नाइंसाफी होगी।
दिल्ली सरकार और DSSSB की याचिका खारिज
यह मामला तब उठा जब दिल्ली सरकार और दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (DSSSB) ने CAT के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। उनका तर्क था कि स्पेशल एजुकेशन वाले शिक्षक सामान्य शिक्षा के छात्रों के लिए उपयुक्त नहीं होते। लेकिन अदालत ने इस तर्क को यह कहते हुए खारिज किया कि समय बदल चुका है और शिक्षा व्यवस्था अब समावेशिता और समानता की दिशा में आगे बढ़ रही है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ये शिक्षक किसी भी तरह से कम योग्य नहीं हैं, बल्कि उनके पास अधिक व्यापक प्रशिक्षण है।
RCI की दलील ने मजबूत किया पक्ष
फैसले के दौरान भारतीय पुनर्वास परिषद (Rehabilitation Council of India – RCI) ने भी कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा। परिषद ने कहा कि B.Ed (स्पेशल एजुकेशन) हासिल करने वाले शिक्षक सामान्य और विशेष दोनों तरह के छात्रों को पढ़ाने में सक्षम होते हैं। RCI के अनुसार, इन शिक्षकों ने सामान्य B.Ed पाठ्यक्रम की बुनियादी शिक्षण पद्धतियों के साथ-साथ विशेष बच्चों की जरूरतों के अनुरूप अतिरिक्त प्रशिक्षण भी प्राप्त किया होता है। ऐसे में यह कहना गलत है कि वे सामान्य स्कूलों में पढ़ाने के योग्य नहीं हैं।
शिक्षा में समानता और समावेशिता का संदेश
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर भी जोर दिया कि आज के समय में जब समावेशी शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है यानी हर तरह के बच्चों को एक साथ, समान अवसरों के साथ शिक्षा देना तो शिक्षक समुदाय को विभाजित करना अनुचित है। अदालत ने कहा, “स्पेशल एजुकेशन की ट्रेनिंग रखने वाले शिक्षक समाज में समानता की भावना और संवेदनशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन्हें मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली से बाहर रखना न्यायसंगत नहीं है।” यह फैसला इस दिशा में एक बड़ा कदम है कि सभी बच्चों को, चाहे वे सामान्य हों या विशेष जरूरतों वाले, उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा मिले।
शिक्षकों के लिए बड़ी राहत
इस निर्णय से देशभर के ऐसे हजारों उम्मीदवारों को बड़ी राहत मिली है जिन्होंने वर्षों पहले B.Ed (Special Education) करके शिक्षण सेवा में आने का सपना देखा था, लेकिन उन्हें सामान्य भर्ती में “अयोग्य” बताकर बाहर कर दिया गया था।
अब DSSSB और अन्य राज्य शिक्षण आयोगों की भर्तियों में इन्हें भी समान अवसर मिलेगा। विशेषज्ञों के मुताबिक यह फैसला न केवल नियुक्तियों में पारदर्शिता लाएगा बल्कि शिक्षण क्षेत्र में योग्यता पर आधारित चयन (merit-based inclusion) को भी बढ़ावा देगा।
शिक्षा जगत में स्वागत
शिक्षा विशेषज्ञों और शिक्षकों के संगठनों ने इस निर्णय का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह निर्णय शिक्षण पेशे में समान अवसरों की दिशा में एक “मील का पत्थर” है। कई शिक्षकों ने सोशल मीडिया पर खुशी जाहिर करते हुए लिखा कि यह फैसला उनके “सालों पुराने संघर्ष” की जीत है।

















