
अंतरराष्ट्रीय व्यापार और अर्थव्यवस्था के बदलते दौर में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या कोई देश अपनी राष्ट्रीय मुद्रा को पूरी तरह त्याग कर किसी दूसरे देश की करेंसी को अपना सकता है? जवाब है ‘हाँ’, अर्थशास्त्र की भाषा में इस प्रक्रिया को ‘डॉलराइजेशन’ (Dollarization) कहा जाता है।
हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2024-2025 के दौरान, दुनिया भर में ‘डी-डॉलराइजेशन’ (डॉलर के दबदबे को कम करना) की चर्चाएं तेज हुई हैं, लेकिन कई देश आज भी अपनी आर्थिक नैया पार लगाने के लिए अमेरिकी डॉलर पर ही भरोसा जता रहे हैं।
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क्या है डॉलराइजेशन का असली खेल?
डॉलराइजेशन तब होता है जब कोई देश अपनी स्थानीय मुद्रा के बजाय अमेरिकी डॉलर को ‘लीगल टेंडर’ (कानूनी निविदा) के रुप में उपयोग करना शुरु कर देता है, यह दो तरह का होता है:
- आधिकारिक डॉलराइजेशन: इसमें देश अपनी करेंसी को पूरी तरह खत्म कर देता है। जैसे इक्वाडोर ने साल 2000 में अपने ‘सुक्रे’ (Sucre) को छोड़कर डॉलर अपनाया था।
- अनौपचारिक डॉलराइजेशन: इसमें लोग अपनी स्थानीय मुद्रा पर भरोसा न होने के कारण बचत और लेन-देन के लिए डॉलर का उपयोग करने लगते हैं।
देश ऐसा जोखिम क्यों उठाते हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार, कोई भी देश अपनी मुद्रा का त्याग खुशी से नहीं, बल्कि मजबूरी में करता है। इसके मुख्य कारण हैं:
- हाइपरइन्फ्लेशन (बेकाबू महंगाई): जब स्थानीय मुद्रा की वैल्यू इतनी गिर जाए कि एक पैकेट दूध के लिए भी झोला भरकर नोट देने पड़ें, जैसा जिम्बाब्वे में हुआ।
- आर्थिक स्थिरता: डॉलर एक वैश्विक रिजर्व करेंसी है, इसे अपनाने से निवेशकों का भरोसा बढ़ता है और बाजार में स्थिरता आती है।
- विदेशी निवेश: स्थिर मुद्रा होने से विदेशी कंपनियां उस देश में पैसा लगाने के लिए अधिक प्रोत्साहित होती हैं।
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कौन-कौन से देश चलते हैं डॉलर के दम पर?
साल 2025 की रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका के अलावा लगभग 11 से अधिक देश और क्षेत्र आधिकारिक तौर पर अमेरिकी डॉलर का उपयोग कर रहे हैं, इनमें प्रमुख हैं:
- इक्वाडोर: 2000 के आर्थिक संकट के बाद से पूरी तरह डॉलर पर निर्भर।
- अल साल्वाडोर: 2001 में डॉलर को आधिकारिक दर्जा दिया।
- पनामा: यहाँ डॉलर और स्थानीय ‘बालबोआ’ दोनों चलते हैं।
- अन्य: तिमोर-लेस्ते, पलाऊ, मार्शल आइलैंड्स और माइक्रोनेशिया जैसे छोटे देश भी इसी सूची में हैं।
फायदे और नुकसान का गणित
जहाँ एक तरफ डॉलराइजेशन से महंगाई पर लगाम लगती है, वहीं इसके कुछ गंभीर नुकसान भी हैं:
- नीतियों पर नियंत्रण खत्म: देश अपना केंद्रीय बैंक होने के बावजूद ब्याज दरें खुद तय नहीं कर सकता; उसे अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसलों पर निर्भर रहना पड़ता है।
- नोट छापने की शक्ति का अंत: देश संकट के समय नए नोट छापकर संकट दूर नहीं कर सकता।
- राष्ट्रीय पहचान: मुद्रा किसी भी देश की संप्रभुता का प्रतीक होती है, जिसे खोना एक बड़ा राजनीतिक जोखिम है।
2025 का नया ट्रेंड: डी-डॉलराइजेशन (De-Dollarization)
एक तरफ जहाँ कुछ देश डॉलर को लाइफलाइन मानते हैं, वहीं BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) जैसे बड़े समूह डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं, दिसंबर 2025 की ताजा अपडेट्स के मुताबिक, BRICS देश ‘Unit’ नामक एक नई डिजिटल ट्रेड करेंसी का परीक्षण कर रहे हैं, जो सोने पर आधारित हो सकती है।
डॉलराइजेशन डूबती अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक ‘इमरजेंसी बूस्टर’ की तरह काम करता है, लेकिन इसके लिए देश को अपनी वित्तीय आजादी की कीमत चुकानी पड़ती है।

















