तलाक पर पत्नी को मिलेगा पति से मिला सारा सामान वापस, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश आया सामने!

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: मुस्लिम तलाक के बाद दूल्हे को दुल्हन के माता-पिता के तोहफे लौटाने होंगे! 1986 कानून से महिलाओं को सोना-नकदी पर हक, पितृसत्तात्मक भेदभाव पर तगड़ा प्रहार। कलकत्ता HC का फैसला पलटा, आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित। समाज में बदलाव की नई शुरुआत!

Published On:
supreme court says on divorce muslim man must return bride parents gifts

सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। अब अगर मुस्लिम जोड़े का वैवाहिक जीवन टूट जाए, तो दूल्हे को दुल्हन के माता-पिता द्वारा शादी के समय दिए गए तोहफे, जैसे सोना, नकदी या घरेलू सामान, सब वापस करने पड़ेंगे। यह फैसला महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा और गरिमा को मजबूत करने वाला है, जो समाज में अभी भी मौजूद पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ एक तगड़ा जवाब है।

फैसले का बैकग्राउंड

यह मामला रौशनआरा बेगम और उनके पूर्व पति एस.के. सलाहउद्दीन के बीच का था। निचली अदालत ने महिला के हक में फैसला दिया था, जिसमें करीब 17.67 लाख रुपये, 30 भोरी सोना और अन्य सामान लौटाने का आदेश था। लेकिन कलकत्ता हाईकोर्ट ने नवंबर 2022 और जनवरी 2024 के आदेशों में इसे पलट दिया, कहते हुए कि तोहफे पति के नाम थे। जस्टिस संजय करोल और एन.के. सिंह की बेंच ने इसे गलत ठहराया और हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि शादी के रजिस्टर में छोटी-मोटी गड़बड़ी को आधार बनाकर महिला के अधिकार छीनना ठीक नहीं।

कानूनी आधार क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3(1)(d) का हवाला दिया। इस धारा के मुताबिक, तलाकशुदा मुस्लिम महिला को शादी से पहले, दौरान या बाद में उसके रिश्तेदारों, दोस्तों, पति या उसके परिजनों से मिली हर संपत्ति पर अधिकार है। कोर्ट ने जोर दिया कि यह कानून सिर्फ कानूनी किताबी बात नहीं, बल्कि महिलाओं के जीवन की हकीकत को ध्यान में रखकर बना है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़ा है, जो जीवन और गरिमा का अधिकार देता है। व्याख्या करते वक्त अदालतों को समानता, स्वायत्तता और महिलाओं के वास्तविक संघर्षों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

समाज पर क्या पड़ेगा असर?

हमारे समाज में, खासकर छोटे शहरों और गांवों में, तलाक के बाद महिलाएं अक्सर आर्थिक रूप से कमजोर पड़ जाती हैं। पुरुष तोहफों को अपनी जायदाद समझ लेते हैं, जबकि ये महिला की सुरक्षा के लिए दिए जाते हैं। यह फैसला ऐसी महिलाओं को ताकत देगा, जो पहले चुप रह जाती थीं। कोर्ट ने बेंच ने साफ शब्दों में कहा कि पितृसत्तात्मक भेदभाव आज भी जिंदा है, और अदालतों को सामाजिक न्याय की नजर से फैसले करने चाहिए। संविधान समानता का सपना दिखाता है, जो अभी पूरा नहीं हुआ, इसलिए न्यायिक फैसलों से इसे आगे बढ़ाना होगा। इससे न सिर्फ मुस्लिम महिलाओं को फायदा होगा, बल्कि पूरे समाज में जागरूकता फैलेगी।

आगे की राह

कोर्ट ने पूर्व पति को 6 हफ्तों में रकम जमा करने और हलफनामा देने का आदेश दिया, वरना 9% ब्याज देना पड़ेगा। यह फैसला अन्य मामलों के लिए मिसाल बनेगा। महिलाओं को अब हिम्मत से अपने हक के लिए लड़ना चाहिए। अगर आप या आपके जानने वाले किसी ऐसे मामले में हैं, तो कानूनी सलाह लें। यह बदलाव लंबे समय तक महिलाओं की जिंदगी आसान बनाएगा।

Author
Pinki

Leave a Comment

Related News

🔥 वायरल विडिओ देखें