
बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है, जिसने हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत संपत्ति के दावों को लेकर चली आ रही एक बड़ी उलझन को सुलझा दिया है, कोर्ट ने स्पष्ट रुप से कहा है कि नाना की पैतृक संपत्ति में नाती-नातिन का जन्म से कोई ‘सहदायिक’ (coparcener) या जन्मसिद्ध अधिकार नहीं होता है, यह फैसला संपत्ति विवादों से जुड़े मामलों में एक नज़ीर बन सकता है।
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पैतृक संपत्ति बनाम मातृ संपत्ति
न्यायमूर्ति अविनाश घरोटे की एकल पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत ‘सहदायिक’ का दर्जा केवल पिता के वंश (पैतृक संपत्ति) से प्राप्त होता है, यह अधिकार जन्म के साथ ही मिल जाता है। हालांकि, नाना की संपत्ति को पैतृक संपत्ति नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह माँ के वंश से आती है।
‘बाधित विरासत’ का सिद्धांत
अदालत ने नाना की संपत्ति को ‘बाधित विरासत’ (Obstructed Heritage या sapratibandha daya) की श्रेणी में रखा है, इसका सीधा अर्थ है कि संपत्ति पर नाती-नातिन का अधिकार तत्काल और स्वतः नहीं होता, बल्कि यह संपत्ति के मालिक (नाना) की मृत्यु और अन्य प्राथमिक वारिसों की मौजूदगी पर निर्भर करता है।
माँ के जीवित रहते दावा संभव नहीं
फैसले में कहा गया कि नाती-नातिन अपनी माँ के जीवित रहते हुए नाना की संपत्ति में सीधे बंटवारे का दावा नहीं कर सकते, संपत्ति पर पहला अधिकार नाना के तत्काल वारिसों का होता है। नाती-नातिन केवल अपनी माँ के माध्यम से ही संपत्ति में हिस्सा पा सकते हैं, और वह भी माँ की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के क्रम में।
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2005 संशोधन अधिनियम की भूमिका
हाई कोर्ट ने 2005 के हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम का भी उल्लेख किया, जिसने बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के समान अधिकार दिए। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह समानता केवल बेटी तक ही सीमित है, यह अधिकार स्वचालित रूप से उसके बच्चों (नाती-नातिन) को नाना की संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार के रुप में हस्तांतरित नहीं होता है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला विरासत कानून की बारीकियों को स्पष्ट करता है। यह उन कई मुकदमों पर विराम लगाएगा जिनमें नाती-नातिन अपने दादा की संपत्ति की तर्ज पर नाना की संपत्ति में भी सीधे हिस्सेदारी का दावा करते थे, यह निर्णय स्थापित करता है कि विरासत का प्रवाह (flow of inheritance) पैतृक और मातृ दोनों पक्षों में अलग-अलग कानूनी सिद्धांतों द्वारा शासित होता है।

















