
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने हाल ही में विरासत कानून से जुड़े एक मामले में एक अहम फैसला सुनाया है, जिसने एक बार फिर पैतृक संपत्ति में बेटियों के अधिकारों से संबंधित कानूनी प्रावधानों को स्पष्ट किया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि किसी पिता की मृत्यु हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के लागू होने से पहले हुई थी, तो उनकी बेटी को पैतृक संपत्ति में हिस्सा पाने का अधिकार नहीं होगा।
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जानें क्या है पूरा मामला और फैसले की मुख्य बातें
कानून की समय-सीमा है निर्णायक
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि संपत्ति के उत्तराधिकार का निर्धारण उस विशेष तारीख पर लागू कानून के आधार पर किया जाता है, जिस दिन संपत्ति के मालिक (पिता) की मृत्यु हुई थी।
- कोर्ट ने बताया कि 17 जून, 1956 को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने से पहले, मिताक्षरा कानून (Mitakshara Law) प्रभावी था। इस प्राचीन कानून के तहत, संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति में केवल पुरुष सदस्यों (बेटों) को ही जन्मजात अधिकार प्राप्त थे। बेटियों को आमतौर पर सहदायिक (coparcener) नहीं माना जाता था।
- चूंकि विचाराधीन मामले में पिता की मृत्यु 1956 के अधिनियम के लागू होने से काफी पहले हो चुकी थी, इसलिए अदालत ने माना कि संपत्ति का बँटवारा पुराने कानून के अनुसार ही होगा।
2005 के संशोधन की भूमिका
यह फैसला मौजूदा कानूनी ढांचे में बेटियों के अधिकारों को कम नहीं करता है। हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 ने कानूनी परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया है।
- 2005 के संशोधन के बाद, बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर का अधिकार दिया गया है, वे जन्म से ही संपत्ति में सहदायिक मानी जाती हैं, भले ही उनकी शादी हो चुकी हो।
- सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि 2005 का संशोधन पूर्वव्यापी रूप से लागू होता है, बशर्ते पिता और बेटी दोनों उस समय जीवित हों (या कुछ मामलों में केवल बेटी)।
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हाई कोर्ट का यह विशिष्ट फैसला एक तकनीकी और समय-बद्ध कानूनी व्याख्या पर आधारित है, इसका यह मतलब नहीं है कि आधुनिक भारत में बेटियों को संपत्ति का अधिकार नहीं है, वर्तमान हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत, बेटियों को अपने पिता की स्व-अर्जित और पैतृक दोनों संपत्तियों में पूर्ण और समान अधिकार प्राप्त है, यह फैसला केवल उन दुर्लभ मामलों पर लागू होता है जहां विरासत का दावा 1956 पूर्व के युग से जुड़ा हुआ है।

















