
सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति कानून के संबंध में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है, जो देश भर में नाबालिगों के संपत्ति अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई प्राकृतिक अभिभावक (Natural Guardian) अदालत की पूर्व अनुमति के बिना किसी नाबालिग की अचल संपत्ति बेचता है, तो वह लेनदेन पूर्ण रूप से गैरकानूनी नहीं, बल्कि ‘शून्यकरणीय’ (Voidable) माना जाएगा।
फैसले की मुख्य जानकारी
सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 (Hindu Minority and Guardianship Act, 1956) की धारा 8 की व्याख्या करते हुए यह व्यवस्था दी है।
अदालती अनुमति अनिवार्य
अधिनियम की धारा 8 स्पष्ट रूप से कहती है कि अभिभावक को नाबालिग के सर्वोत्तम हित में भी, उसकी संपत्ति के हस्तांतरण (बिक्री, गिरवी रखना या उपहार) के लिए सक्षम न्यायालय से अनिवार्य रूप से अनुमति लेनी होगी।
‘शून्य’ बनाम ‘शून्यकरणीय’
कोर्ट ने यह भेद किया कि ऐसी बिक्री ‘शून्य’ (Void) नहीं, बल्कि ‘शून्यकरणीय’ (Voidable) होती है। ‘शून्य’ का अर्थ है कि वह सौदा शुरू से ही अस्तित्वहीन है, जबकि ‘शून्यकरणीय’ का अर्थ है कि यह तब तक वैध है जब तक कि पीड़ित पक्ष (यहां नाबालिग, वयस्क होने के बाद) इसे चुनौती नहीं देता।
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वयस्क होने पर रद्द करने का अधिकार
संपत्ति का मालिक 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद, एक निश्चित समय-सीमा के भीतर (आमतौर पर बालिग होने के 3 साल के भीतर) उस बिक्री को अस्वीकार (Repudiate) कर सकता है।
औपचारिक मुकदमे की जरुरत नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में कहा कि बिक्री को अस्वीकार करने के लिए हमेशा एक औपचारिक दीवानी मुकदमा (Civil Suit) दायर करना आवश्यक नहीं है। संपत्ति मालिक का आचरण, जैसे कि संपत्ति पर कब्जा बनाए रखना या किसी तीसरे पक्ष को उसे बेचना, भी अस्वीकृति माना जा सकता है।
खरीदार का जोखिम
- यदि मालिक वयस्क होने पर बिक्री रद्द कर देता है, तो मूल खरीदार का संपत्ति पर कोई कानूनी अधिकार नहीं रह जाता है।
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यह फैसला उन संभावित विवादों को समाप्त करता है जहां खरीदार यह तर्क देते थे कि उन्हें नहीं पता था कि संपत्ति बेचने वाला व्यक्ति अभिभावक था और उनके पास अदालत की अनुमति नहीं थी। अब यह स्पष्ट है कि नाबालिगों के हितों को सर्वोपरि रखा जाएगा।

















