
भारतीय दूरसंचार क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव की सुगबुगाहट तेज हो गई है, अब आपको अपने स्मार्टफोन पर लाइव मैच, फिल्में या समाचार देखने के लिए महंगे डेटा पैक या वाई-फाई पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं होगी, भारत सरकार ‘डायरेक्ट-टू-मोबाइल’ (D2M) तकनीक की टेस्टिंग शुरू कर चुकी है, जिसने टेलीकॉम कंपनियों की नींद उड़ा दी है।
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क्या है D2M तकनीक?
D2M या ‘डायरेक्ट-टू-मोबाइल’ तकनीक ठीक उसी तरह काम करती है जैसे आपके घर में लगा ‘डायरेक्ट-टू-होम’ (DTH) यानी छतरी वाला टीवी काम करता है, इसमें ब्रॉडकास्टर सीधे मोबाइल फोन तक सिग्नल भेजते हैं, इसके लिए सिम कार्ड या इंटरनेट की आवश्यकता नहीं होती, जिससे उपयोगकर्ता बफरिंग मुक्त स्ट्रीमिंग का आनंद ले सकते हैं।
देश के 19 शहरों में टेस्टिंग जारी
ताजा अपडेट के अनुसार, प्रसार भारती और आईआईटी कानपुर के सहयोग से देश के 19 से अधिक शहरों में इस तकनीक का परीक्षण किया जा रहा है, सरकार का लक्ष्य है कि 2026 के मध्य तक इसे व्यावसायिक रूप से रोलआउट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाए, इस बुनियादी ढांचे को तैयार करने के लिए लगभग ₹8,000 करोड़ के निवेश का अनुमान लगाया गया है।
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टेलीकॉम कंपनियों में क्यों है खलबली?
D2M तकनीक की आहट से रिलायंस जियो, एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया जैसी दिग्गज टेलीकॉम कंपनियों में चिंता का माहौल है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- डेटा रेवेन्यू में गिरावट: मोबाइल पर होने वाले कुल डेटा इस्तेमाल का लगभग 80% हिस्सा वीडियो स्ट्रीमिंग में जाता है। अगर यह मुफ्त हो गया, तो टेलीकॉम कंपनियों की कमाई पर सीधा असर पड़ेगा।
- स्पेक्ट्रम का मुद्दा: कंपनियां चाहती हैं कि जिस स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल इस तकनीक के लिए हो रहा है, उस पर नीलामी की समान शर्तें लागू हों।
- हार्डवेयर की चुनौती: वर्तमान स्मार्टफोन में D2M सिग्नल पकड़ने के लिए खास चिपसेट की जरूरत होगी, जिससे फोन की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी हो सकती है।
आम जनता को क्या होगा फायदा?
- मुफ्त मनोरंजन: बिना इंटरनेट खर्च किए लाइव स्पोर्ट्स और टीवी चैनल देखे जा सकेंगे।
- दूरदराज के इलाकों में कनेक्टिविटी: उन ग्रामीण क्षेत्रों में भी वीडियो कंटेंट पहुंचेगा जहाँ इंटरनेट सिग्नल कमजोर हैं।
- इमरजेंसी अलर्ट: आपदा के समय सरकार बिना नेटवर्क के भी सीधे लोगों के फोन तक जरूरी जानकारी पहुंचा सकेगी।
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D2M तकनीक भारत में डिजिटल क्रांति का अगला अध्याय साबित हो सकती है, हालांकि, टेलीकॉम ऑपरेटरों के विरोध और विनियामक बाधाओं को देखते हुए यह देखना दिलचस्प होगा कि 2026 तक यह तकनीक आम आदमी की जेब तक किस तरह पहुँचती है।

















