
सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति विवादों को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मकान मालिकों के अधिकारों को सर्वोपरि माना है, अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि किरायेदार यह तय नहीं कर सकता कि मकान मालिक को अपनी संपत्ति का उपयोग कैसे करना चाहिए, इसी के साथ, शीर्ष अदालत ने करीब 50 साल से रह रहे एक किरायेदार को परिसर खाली करने का कड़ा आदेश दिया है।
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5 दशक बाद मिला न्याय
यह मामला पश्चिम बंगाल का है, जहाँ एक किरायेदार पिछले 50 वर्षों से संपत्ति पर काबिज था, निचली अदालतों से होते हुए जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, तो जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने किरायेदार की दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक रहने मात्र से किरायेदार को यह हक नहीं मिल जाता कि वह मकान मालिक की जरूरतों पर डिक्टेट (शर्तें थोपना) करे।
फैसले की बड़ी बातें
- मकान मालिक की जरूरत सर्वोपरि: कोर्ट ने कहा कि यदि मकान मालिक को अपनी निजी जरूरत (Bona fide requirement) के लिए जगह चाहिए, तो किरायेदार उसे यह नहीं बता सकता कि वह अपना काम कम जगह में चला ले।
- शर्तें नहीं थोप सकता किरायेदार: फैसले के अनुसार, किरायेदार को यह चुनने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है कि मकान मालिक के लिए कौन सा हिस्सा उपयुक्त है या कौन सा नहीं।
- दशकों पुराना कब्जा भी वैध नहीं: कोर्ट ने साफ किया कि किरायेदारी चाहे कितनी भी पुरानी हो, वह मालिकाना हक में तब्दील नहीं होती।
कानूनी प्रभाव
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से उन मकान मालिकों को बड़ी राहत मिलेगी जिनके मामले वर्षों से “निजी आवश्यकता” के आधार पर कोर्ट में लंबित हैं। यह फैसला स्पष्ट करता है कि संपत्ति का वास्तविक नियंत्रण मालिक के पास ही रहेगा।
यदि आप किरायेदारी कानून और अपने अधिकारों के बारे में विस्तार से पढ़ना चाहते हैं, तो India Code (Rent Control Acts) पर जाकर संबंधित राज्यों के अधिनियम देख सकते हैं। साथ ही, कानूनी परामर्श के लिए Department of Justice की आधिकारिक वेबसाइट पर विज़िट करें।

















