
केरल हाई कोर्ट ने दिसंबर 2025 में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी बच्चे का जन्म माता-पिता की शादी के मात्र चार महीने बाद भी होता है, तो वह बच्चा कानूनी रुप से वैध (Legitimate) माना जाएगा और अपने दिवंगत पिता की संपत्ति में समान हिस्सेदारी का हकदार होगा।
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न्यूज रिपोर्ट: केरल हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
जस्टिस सतीश निनान और जस्टिस पी. कृष्ण कुमार की खंडपीठ ने यह ऐतिहासिक फैसला एक हिंदू परिवार के संपत्ति विवाद (विभाजन वाद) की सुनवाई के दौरान दिया,अदालत ने निचली अदालत के उस पुराने आदेश को पलट दिया, जिसमें एक बेटी को सिर्फ इसलिए उत्तराधिकार से वंचित कर दिया गया था क्योंकि उसका जन्म माता-पिता के विवाह के चार महीने के भीतर हुआ था।
लेख के मुख्य बिंदु और अदालती टिप्पणियां
- कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 112 का हवाला देते हुए कहा कि वैध विवाह के दौरान जन्म लेने वाला बच्चा कानूनन वैध माना जाता है。 इस धारणा को केवल तभी चुनौती दी जा सकती है जब यह साबित हो जाए कि गर्भधारण के समय पति-पत्नी के बीच संपर्क (non-access) संभव नहीं था।
- हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून की नजर में यह महत्वपूर्ण नहीं है कि गर्भधारण शादी से पहले हुआ था या बाद में। यदि जन्म के समय विवाह कानूनी रूप से अस्तित्व में था, तो पितृत्व और उत्तराधिकार के अधिकार स्वतः सुनिश्चित हो जाते हैं।
- अदालत ने आदेश दिया कि संपत्ति का विभाजन पांच बराबर हिस्सों में किया जाए, जिसमें मृतक की विधवा, उसकी माता और सभी बच्चों (जन्म के समय के अंतर के बिना) को क्लास-1 उत्तराधिकारी के रूप में समान हिस्सा मिले।
- खंडपीठ ने टिप्पणी की कि निचली अदालत ने धारा 112 को लागू न करने में गंभीर कानूनी त्रुटि की थी, कानून “जैविक सत्य” के बजाय “कानूनी वैधता” को प्राथमिकता देता है ताकि बच्चों के अधिकारों और उनके सामाजिक सम्मान की रक्षा की जा सके।
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मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद ‘सुजाता कृष्णन एवं अन्य बनाम राधा मोहनदास एवं अन्य’ मामले से संबंधित था, व्यक्ति की 2012 में बिना वसीयत छोड़े मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद संपत्ति के बंटवारे को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू हुई थी। हाईकोर्ट के इस 19 दिसंबर 2025 के फैसले ने भविष्य के ऐसे मामलों के लिए एक ठोस मिसाल कायम की है।

















